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ओट्स दलिया को ज़्यादा पौष्टिक कैसे बनाएं: मक्खन, क्रीम और रात भर भिगोने वाली पारंपरिक रेसिपी
पारंपरिक ओट्स दलिया में मक्खन, क्रीम डाली जाती थी और ओट्स को रात भर भिगोया जाता था। जानिए इससे क्या फ़र्क पड़ता है, और पेकान व दालचीनी वाली रेसिपी बनाइए।

"ज्ञान सुबह के दलिया में बसता है," एक स्कॉटिश कहावत कहती है। नाश्ता डिब्बों और बार्स में आने से पहले चूल्हे पर रखी एक पतीली से आता था। ओट्स दलिया सुबहों का खामोश मेहनतकश साथी था। यह वह भोजन था जो खेत में किसानों को, स्कूल में बच्चों को और लंबी सर्दियों में पूरे परिवार को संभाले रखता था।
यह कभी इंस्टेंट नहीं होता था, न ही इसमें से मलाई निकाली जाती थी। भाप उड़ाती हर कटोरी के ऊपर मक्खन, क्रीम या दूध डाला जाता था, क्योंकि लोग वह बात जानते थे जो आधुनिक लेबलों ने हमें भुला दी है: पोषण कैलोरी की बात नहीं, सहनशक्ति की बात है।
यह लेख Weston A. Price Foundation में छपे क्रिस्टीना मैकआर्थर (Cristina MacArthur) के एक लेख का रूपांतरण है। इसमें बताया गया है कि दलिया को गाढ़ी चिकनाई की ज़रूरत क्यों होती है, ओट्स को भिगोकर रखना क्यों फ़ायदेमंद है और पारंपरिक तरीक़े से इसे कैसे बनाया जाता है।
वह ओट्स जिसने स्कॉटलैंड को सहारा दिया
ओट्स ने कभी ज़िंदगियाँ थामी थीं। स्कॉटलैंड के हाइलैंड्स में, जहाँ गेहूँ और जौ अक्सर नाकाम हो जाते थे, ओट्स उथली और पथरीली मिट्टी में भी पनप जाता था। इसी जुझारूपन ने उसे जीवन-रेखा बना दिया: ग़रीबों का अनाज, जो बाक़ी फ़सलें फेल होने पर भी परिवारों को ज़िंदा रखता था। फ़ाउंडेशन ने यह लंबा इतिहास So Much More than Scottish Porridge में बताया है।
छोटे-छोटे कॉटेजों में दलिया पीट की आग पर धीमी आँच में पकता था और पूरा घर क्रीम और धुएँ की ख़ुशबू से भर जाता था। पतीली चलाना एक रस्म थी: हमेशा घड़ी की दिशा में, कभी उलटी दिशा में नहीं, ताकि दिन के लिए सौभाग्य और आशीर्वाद खिंचे चले आएँ। ठंडा होने पर बचा हुआ दलिया साँचों में उँडेल दिया जाता, टुकड़ों में काट लिया जाता और सफ़र में साथ ले जाया जाता था। हफ़्ते भर का खाना पहले से तैयार रखने का यह पुराना तरीक़ा था, और इसके लिए काँच के डिब्बों की ज़रूरत भी नहीं पड़ती थी।
गेलिक लोककथाओं में ओट्स सिर्फ़ पेट भरने का साधन नहीं था, वह एक तरह की सुरक्षा भी था। कहा जाता था कि सुबह की एक कटोरी उदासी और ठंड से बचाती है और बर्फ़ीले मौसम का सामना करने से पहले शरीर और मन को मज़बूत करती है। लेखिका के अनुसार सदियों बाद हमें इसकी वजह पता चली: ओट्स में एवेनैंथ्रामाइड्स होते हैं, जो दुर्लभ एंटीऑक्सीडेंट हैं और सूजन तथा तंत्रिका तंत्र को शांत करते हैं। लोककथाएँ इसी को "दिल को गर्माहट देना" कहती थीं।
ओट्स दलिया को चिकनाई की ज़रूरत क्यों है
मक्खन कभी जीवन-शक्ति और समृद्धि का प्रतीक था, लेकिन आधुनिक "सेहत" अभियानों का शिकार बन गया। उसकी जगह स्किम्ड दूध, मार्जरीन और रिफ़ाइंड बीज तेल (सीड ऑयल) आ गए। ये शेल्फ़ पर लंबे समय तक टिकने के लिए बनाए गए हैं, खाने वाले को लंबी उम्र देने के लिए नहीं। लेखिका के मुताबिक़ नतीजा ऐसे भोजन रहे जो पेट तो भरते थे, पर चुपचाप शरीर में सूजन भी बढ़ाते थे और समय के साथ ऊर्जा और सहनशक्ति छीनते जाते थे।
हमारे परदादा-परदादी इससे ज़्यादा जानते थे। वे बिना किसी अपराधबोध या उलझन के दलिया में मक्खन मिलाते थे। चिकनाई उनके लिए पवित्र थी, क्योंकि प्रकृति ने उसी के ज़रिए एक सादे भोजन को टिकाऊ पोषण में बदलने का रास्ता निकाला है। लेखिका के अनुसार आधुनिक शोध वही दोहराता है जो परंपरा कभी भूली नहीं: मक्खन और क्रीम के विटामिन और फ़ैटी एसिड हार्मोन को संतुलित रखते हैं, मूड सुधारते हैं और दिमाग़ को सेरोटोनिन, यानी "ख़ुशी के अणु", बनाने में मदद करते हैं। मक्खन वाली दलिया की कटोरी कोई ज़्यादती नहीं है, वह नाश्ते के भेस में भावनात्मक स्थिरता है।
मिंगाउ (दलिया) में चर्बी और वसा क्या करती है
ओट्स सेहतमंद हैं, लेकिन अकेले अधूरे हैं। वसा के बिना वे जल्दी पच जाते हैं और सुबह के बीच में ही फिर भूख लगने लगती है। जब ओट्स को मक्खन, क्रीम या फुल-क्रीम दूध का साथ मिलता है, तो पूरा रसायन सही तालमेल में आ जाता है:
- वसा पाचन को धीमा करती है;
- ब्लड शुगर को स्थिर रखती है और ऊर्जा को ज़्यादा देर तक बनाए रखती है;
- शरीर को विटामिन A, D, E और K2 सोखने में मदद करती है। लेखिका के अनुसार ये पोषक तत्व मूड, हार्मोन और रोग-प्रतिरोधक क्षमता को सहारा देते हैं।
पारंपरिक रसोइयाँ इन प्रक्रियाओं के बारे में नहीं जानती थीं। वे बस इतना जानती थीं कि यह तरीका काम करता है।
फुल-क्रीम दूध, क्रीम और चरागाह वाली गायों का मक्खन
दलिया में फुल-क्रीम दूध और क्रीम सिर्फ़ पकाने का तरल नहीं हैं, ये पोषण के वाहक हैं। लेखिका के मुताबिक कच्चे दूध और कच्ची क्रीम की कोई तुलना नहीं है, क्योंकि इनमें एंज़ाइम, प्रोबायोटिक्स और विटामिन वैसे ही मिलते हैं जैसे प्रकृति ने उन्हें बनाया है, और शरीर उन्हें अच्छी तरह इस्तेमाल कर पाता है। फ़ाउंडेशन इस विषय पर पूरा एक अभियान चलाता है, Real Milk, और ब्राज़ील में Nu&Cru का उत्पादकों का नक्शा सीधे फ़ार्म से कच्चा दूध और मक्खन खोजने में मदद करता है।
ऊपर से क्रीम की एक धार या कच्चे मक्खन की एक चम्मच साधारण ओट्स को एक भरपूर और संतुलित भोजन बना देती है, ठीक वैसे ही जैसे हमारे पूर्वज उसे खाते थे। कोई भी "लाइट वेजिटेबल क्रीम" एक चम्मच मक्खन की समृद्धि और संतुलन की बराबरी नहीं कर सकती। चरागाह में चरने वाली गायों का गहरे पीले रंग का मक्खन विटामिन A, D, E और K2 से खास तौर पर भरपूर होता है। जिन्हें दूध के ठोस तत्वों से संवेदनशीलता है, उनके लिए घी एक हल्का, लैक्टोज़-मुक्त विकल्प है, जिसे पाचन को आराम देने के लिए पसंद किया जाता है।
फ़ाउंडेशन की सलाह: आँच बंद करने के बाद गरमागरम दलिया में खुले में पली मुर्गियों के अंडों की एक या दो जर्दी फेंटकर मिला दें। इससे कोलीन और विटामिन A मिलता है, और दलिया की बनावट मखमली हो जाती है।
शहद, मेपल सिरप और नमक: मीठा और नमकीन
शहद और मेपल सिरप जैसे पारंपरिक मीठे पदार्थ जीवन-शक्ति और खनिज देते हैं, और रिफ़ाइन्ड चीनी की तरह ऊर्जा को अचानक नीचे नहीं गिराते। कच्चा शहद एंज़ाइम और मित्र बैक्टीरिया देता है। मेपल सिरप में मैंगनीज़ और ज़िंक जैसे खनिज होते हैं। लेखिका कहती हैं कि दोनों मिलकर पारिस्थितिकी तंत्र के दो हिस्सों को दर्शाते हैं: शहद फूलों और मधुमक्खियों से आता है, और सिरप पेड़ों की छाल और रस से।
बिना रिफ़ाइन किया हुआ साबुत समुद्री नमक, जैसे सेल्टिक नमक, ऐसे सूक्ष्म खनिज देता है जो शरीर में पानी का संतुलन और नसों का संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं। कभी इसका उपयोग पवित्र माना जाता था: यह खाने को सुरक्षित रखता था, घरों को आशीर्वाद देता था और लोगों के बीच जुड़ाव का प्रतीक था। फ़ाउंडेशन असली नमक की पैरवी The Salt of the Earth में करता है।
यहाँ भी विज्ञान और प्रतीकवाद एक-दूसरे से मिलते हैं। मैग्नीशियम और सोडियम जैसे खनिज नसों के संकेत पहुँचाने और भावनाओं को सँभालने के लिए ज़रूरी हैं। लेखिका लिखती हैं, सुबह के दलिया का कटोरा सिर्फ़ शरीर को नहीं खिलाता: वह भीतर के तारों को भी सुर में ला देता है।
स्थानीय शहद: अपने इलाके की चीज़ें खाने की ख़ूबसूरती
अगर हो सके, तो ओट्स को अपने पास के किसी मधुमक्खीपालक से लिए कच्चे शहद से मीठा करें। स्थानीय शहद में आपके इलाके के पराग के अंश होते हैं और लेखिका के अनुसार यह एक छोटी ख़ुराक की तरह काम करता है, जो शरीर को हर मौसम के एलर्जी पैदा करने वाले तत्वों के अनुकूल ढलने में मदद करती है। समय के साथ यह उन्हीं फूलों के प्रति संवेदनशीलता को कम कर सकता है, जिनकी वजह से वसंत में आपको छींकें आती हैं।
बाज़ार के शहद से अलग, जो अक्सर छाना या गर्म किया जाता है, या कई जगहों के शहद को मिलाकर बनाया जाता है, कच्चा स्थानीय शहद एंज़ाइम, प्रोबायोटिक्स और एंटीऑक्सीडेंट सुरक्षित रखता है, जो लेखिका के मुताबिक़ रोग-प्रतिरोधक क्षमता और श्वसन स्वास्थ्य को मज़बूत करते हैं। यह पर्यावरण की परवाह का एक शांत-सा तरीक़ा भी है: हर चम्मच मधुमक्खियों, परागण और उन खेतों को सहारा देता है जो आपके समुदाय का पेट भरते हैं।
शहद को गर्म न करें
कच्चा शहद जीवित होता है, और तेज़ गर्मी उसके नाज़ुक एंज़ाइम, पराग, प्रोबायोटिक्स और रोगाणुरोधी तत्वों को नष्ट कर देती है। शरीर के तापमान से ज़्यादा गर्म करने पर शहद की संरचना बदल जाती है और उसकी उपचार-शक्ति का कुछ हिस्सा खो जाता है। आयुर्वेद गर्म किए गए शहद को शरीर के लिए विषैला मानता है, क्योंकि उससे आम बनता है, एक चिपचिपा अवशेष जो पाचन को धीमा कर देता है।
इसलिए कच्चा शहद परोसने के बाद गुनगुने दलिया के ऊपर डालें, पकाने के दौरान कभी नहीं। लेखिका कहती हैं कि इसी क्षण मिठास सिर्फ़ स्वाद नहीं, औषधि बन जाती है।
मेपल सिरप और कटोरे की बाक़ी चीज़ें
जैसे स्थानीय शहद फूलों का गीत सुनाता है, वैसे ही स्थानीय मेपल सिरप पेड़ों की आवाज़ लिए होता है। जो रस सिरप बनता है, वह हर वसंत में जड़ों से ऊपर चढ़ता है और उस मिट्टी के खनिज साथ लाता है जिस पर आप चलते हैं। ओट्स में मेपल सिरप डालकर आप अपने इलाके के खनिजों का स्वाद लेते हैं, यानी जंगल की धड़कन, जो मिठास में बदल गई है। लेखिका लिखती हैं कि जहाँ शहद प्रतिरक्षा तंत्र को अनुकूल ढलना सिखाता है, वहीं मेपल सिरप अपनी शांत खनिज-शक्ति से हड्डियों, रक्त और नसों को पोषण देता है।
यही सलाह ओट्स, मक्खन और दूध पर भी लागू होती है। स्थानीय भोजन पर आपकी मिट्टी और आपके मौसम की छाप होती है: वह ज़्यादा ताज़ा और खनिजों से भरपूर होता है और लेखिका के शब्दों में, उस धरती के साथ तालमेल में होता है जो आपको पालती है। इस तरह खाना अपने समुदाय की प्राकृतिक लय में शामिल होना है, और सेहत को तथा लोगों, जानवरों और जगह के बीच के अदृश्य रिश्ते को मज़बूत करना है।
इस सबके बावजूद, अगर आप सिर्फ़ एक चीज़ स्थानीय स्तर पर बनी ख़रीद सकते हैं, तो वह शहद हो। मधुमक्खियाँ वहाँ जाती हैं जहाँ हम नहीं जाते, और धरती की औषधि को इतनी सुनहरी और मीठी चीज़ में समेट लाती हैं कि वह उपचार कर सके। ब्राज़ील में, जहाँ मेपल सिरप आयात होता है, यह सलाह और भी ज़्यादा आपके इलाके के मधुमक्खीपालक के शहद के पक्ष में जाती है।
भिगोया हुआ ओट्स: खटास का राज़
आधुनिक आहार में मीठे और नमकीन का बोलबाला है, लेकिन पुराने तौर-तरीक़ों में हमेशा खट्टा शामिल रहता था। हर पारंपरिक आहार में खटास का हल्का स्पर्श इस बात का संकेत था कि भोजन में जान आ गई है। फ्रिज और लेबल से पहले के ज़माने में लोग भोजन को ज़्यादा सुरक्षित, स्वादिष्ट और आसानी से पचने लायक़ बनाने के लिए फ़र्मेंटेशन और प्राकृतिक अम्लों पर निर्भर रहते थे।
नींबू, केफ़िर, सिरके या दही का वह जीवंत स्वाद बताता था कि समय और मित्र बैक्टीरिया के असर से भोजन बदल गया है और ज़्यादा पौष्टिक हो गया है, जैसा कि हमने लैक्टो-फ़र्मेंटेशन वाले लेख में समझाया है। दिन भर थोड़ी-थोड़ी खटास (सुबह नींबू, दोपहर में केफ़िर या सिरका, रात में दही) शरीर की रसायन-क्रिया को जीवंत और पाचन को चालू रखती है, जैसा प्रकृति ने तय किया था। नीचे दी गई तालिका देखें।
ओट्स को भिगोकर क्यों रखें
हमारे पूर्वजों ने देखा कि ओट्स को रात भर भिगोकर रखने से, यानी गुनगुने पानी में एक चम्मच दही, छाछ (मट्ठा) या सेब के सिरके के साथ, दलिया ज़्यादा मलाईदार बनता था और पचाने में भी आसान होता था। लेखिका के अनुसार, विज्ञान ने इस पुरानी समझ की पुष्टि कर दी है: भिगोने से एंज़ाइम सक्रिय होते हैं और फाइटिक एसिड कम होता है, जिससे खनिजों का अवशोषण और पोषक तत्वों का लाभ बेहतर होता है। फ़ाउंडेशन इस विषय को Living with Phytic Acid में विस्तार से समझाता है।
ज़्यादातर अनाजों की तरह ओट्स में भी एंज़ाइम इन्हिबिटर और थोड़ी मात्रा में ऑक्सेलिक एसिड होता है। ये प्राकृतिक तत्व बीज की रक्षा करते हैं, लेकिन बिना निष्क्रिय किए खाए जाएँ तो खनिजों के अवशोषण को रोक सकते हैं और पाचन में परेशानी पैदा कर सकते हैं। भिगोने की हल्की अम्लीयता इन सुरक्षा कवचों को तोड़ने में मदद करती है और दाने को सोए हुए से पचने योग्य बना देती है, यानी जीवित रहने भर के भोजन से असली पोषण में बदल देती है। Nu&Cru इसी सोच पर किण्वित ओट्स दलिया बनाता है।
भिगोने से पहले भूनना
भिगोने या पकाने से पहले, कई पारंपरिक रसोइयाँ एक छोटी-सी रस्म से शुरुआत करती थीं: ओट्स को मक्खन या घी में भूनना। धीमी आँच पर कुछ मिनट भूनने से दाने की प्राकृतिक खुशबू निकलती है, स्वाद गहरा होता है और, लेखिका के अनुसार, एंज़ाइम इन्हिबिटर निष्क्रिय होने लगते हैं। माना जाता है कि भूनने से पाचन बेहतर होता है और एवेनन्थ्रामाइड जैसे एंटीऑक्सीडेंट निकलते हैं, वही तत्व जो सूजन और त्वचा को शांत करते हैं। इसे दाने की सुबह की अंगड़ाई समझिए, धीमी पकाई से पहले एक कोमल जागरण।
भावनात्मक कीमिया: वह दलिया जो मन शांत करता है
पोषक तत्वों से परे, ओट्स का एक शांत-सा मनोविज्ञान भी है। लेखिका के अनुसार, गरम ओट्स की खुशबू ऑक्सीटोसिन छोड़ने में मदद करती है, वही हार्मोन जो गले लगाने और स्तनपान से जुड़ा है, जो शरीर को शांत करता है और पूरे घर का मिज़ाज नर्म कर देता है। सदियों से माँएँ दलिया सिर्फ़ पेट भरने के लिए नहीं, दिलों को सुकून देने के लिए भी परोसती आई हैं।
शायद इसीलिए पुरानी जड़ी-बूटी चिकित्सा में ओट्स को सिर्फ़ भोजन नहीं, बल्कि नसों की दवा के रूप में बताया जाता था। माना जाता था कि एक कप ओट स्ट्रॉ की चाय या एक कटोरी दलिया "उदास को हँसाता और थके हुए को तरोताज़ा करता है"। लेखिका कहती हैं कि आज हम जानते हैं कि ओट्स में मौजूद विटामिन बी कॉम्प्लेक्स, मैग्नीशियम और एवेनिन सचमुच तंत्रिका तंत्र को पोषण देते हैं। भोजन और मन का मिज़ाज कभी अलग नहीं चलते।
असली खाना जेब पर भारी नहीं पड़ता
असली खाना अक्सर पैकेट वाले विकल्पों से ज़्यादा सरल और सस्ता होता है। ओट्स का एक पैकेट, मक्खन की एक टिक्की और एक लीटर दूध पूरे परिवार का कई दिनों तक पेट भर सकते हैं। ऐसे भोजन ब्लड शुगर को स्थिर रखते हैं, बार-बार कुछ खाने की इच्छा घटाते हैं और मन को शांति देते हैं। यह बात बच्चों की सुबहों पर भी लागू होती है, जैसा कि हमने बच्चों के लिए नाश्ता में बताया है।
जब हम प्रकृति की लय में खाते हैं, तो संतुलन लौट आता है। कृत्रिम वनस्पति क्रीम की जगह मक्खन, refined चीनी की जगह शहद और टेबल सॉल्ट की जगह खनिज नमक अपनाने से सिर्फ़ स्वाद ही नहीं लौटता, बल्कि धरती, परंपरा और दूसरे लोगों से जुड़ाव भी लौटता है। और अगर आपको शक है कि दलिया की एक साधारण कटोरी आपका दिन बदल सकती है, तो याद रखिए: जो खाना शरीर को शांत करता है, वही मन को भी शांत करता है।
रोज़ थोड़ा-सा अम्ल
नींबू। लेखिका के अनुसार, गुनगुने पानी में या दलिये पर नींबू की कुछ बूँदें लिवर और पाचन को हल्के से जगा देती हैं। नींबू शरीर को खनिज सोखने में मदद करता है, विटामिन C देता है और पित्त के स्वस्थ प्रवाह में सहायक होता है। सादा-सा होने पर भी सुबह नींबू पानी शरीर की प्राकृतिक सफ़ाई प्रणाली को "चालू" करने का एक पुराना और बेहतरीन तरीक़ा है।
सेब का सिरका। कच्चा, धुंधला सेब का सिरका, अपनी "मदर" के साथ, दुनिया के सबसे पुराने पाचन टॉनिकों में से एक है। चिकित्सा के जनक हिप्पोक्रेट्स स्वयं शहद के साथ सिरका, यानी ऑक्सिमेल, शक्ति और जीवनशक्ति के अमृत के रूप में इस्तेमाल करते थे। लेखिका कहती हैं कि खाने से पहले थोड़े पानी में एक चम्मच सिरका ब्लड शुगर को संतुलित रखता है, खनिजों के अवशोषण में मदद करता है और पाचन को तेज़ करता है।
केफ़िर, प्रोबायोटिक्स का राजा। सभी फ़र्मेंटेड खाद्य पदार्थों में केफ़िर का स्थान सबसे ऊपर है। इसकी खटास तीस से भी ज़्यादा प्रकार के लाभकारी बैक्टीरिया और यीस्ट के एक शक्तिशाली समुदाय से आती है, जो दही या किसी भी फ़ार्मेसी कैप्सूल से कहीं ज़्यादा है। लेखिका के अनुसार ये जीवित सूक्ष्मजीव आँत की दीवार को मज़बूत करते हैं, सूजन को शांत करते हैं और भीतर से रोग-प्रतिरोधक क्षमता बनाते हैं। रोज़ आधा कप कच्चे दूध का केफ़िर आपके भीतरी बाग़ को फिर से बोने और हरा-भरा रखने के लिए काफ़ी है।
दही। अगर केफ़िर जीवित चिंगारी है, तो दही शांत और स्थिर लौ है। इसकी हल्की खटास शरीर को ठंडक और शांति देती है, प्रोटीन और वसा को पचाने में मदद करती है और लाभकारी बैक्टीरिया को आँत तक पहुँचाती है। अधिकतम पोषण के लिए हमेशा जीवित कल्चर वाला फुल-क्रीम दूध का दही चुनें।
रेसिपी: मक्खन, दालचीनी और पेकान वाला ओट्स दलिया
2 से 3 लोगों के लिए। मूल रेसिपी में मेपल सिरप है; उसकी जगह melado de cana (गन्ने का गाढ़ा शीरा) इस्तेमाल किया जा सकता है।
सामग्री
- 4 बड़े चम्मच (लगभग 55 g) मक्खन, बेहतर हो कि चरागाह में चरने वाली गायों का हो
- ½ कप कटे हुए पेकान (फ़ाउंडेशन इन्हें भिगोकर सुखाने का तरीक़ा Crispy Pecans में सिखाता है)
- 1 छोटा चम्मच दालचीनी पाउडर
- 2 छोटे चम्मच शुद्ध मेपल सिरप, या स्वादानुसार
- 1 छोटा चम्मच स्थानीय कच्चा शहद (ऊपर से डालने के लिए, पकाने के लिए नहीं)
- 2 कप (480 ml) फ़िल्टर किया हुआ पानी
- 1 कप भिगोया हुआ ओट्स (तैयारी नीचे देखें)
- ½ छोटा चम्मच समुद्री नमक
- ½ कप (120 ml) ताज़ी क्रीम
- ऊपर सजाने के लिए थोड़ा और मेपल सिरप या अलग रखे हुए पेकान
ओट्स की तैयारी (पारंपरिक तरीक़ा)
1 कप रोल्ड ओट्स को बेकिंग ट्रे में फैलाएँ और 180 °C के ओवन में हल्का सुनहरा और ख़ुशबूदार होने तक भूनें। भुने हुए ओट्स को ग्राइंडर या प्रोसेसर में मध्यम दरदरा पीस लें: नतीजा कुछ आटे जैसा और कुछ छोटे टुकड़ों जैसा होना चाहिए।
पिसे हुए ओट्स को एक कटोरे में रखें और उसमें 2 कप गुनगुना पानी तथा 2 बड़े चम्मच व्हे (दूध का मट्ठा), दही, केफ़िर या बटरमिल्क मिलाएँ। जिन्हें डेयरी से संवेदनशीलता है, वे 1 बड़ा चम्मच नींबू का रस या सेब का सिरका ले सकते हैं। इसे गर्म जगह पर 7 से 24 घंटे भीगने दें। आटे के सबसे महीन कण ऊपर आ जाएँगे, जिन्हें चम्मच से सावधानी से निकाला जा सकता है। फ़ाउंडेशन अपना क्लासिक संस्करण भी Breakfast Porridge: Soaked Oatmeal में प्रकाशित करता है।
बनाने की विधि
- एक मध्यम पतीले में 2 बड़े चम्मच मक्खन पिघलाएँ। भिगोया हुआ ओट्स डालें और धीमी आँच पर चलाते हुए तब तक गर्म करें जब तक उसकी ख़ुशबू न उठने लगे।
- पानी और नमक डालें। हल्का उबाल आने दें और बार-बार चलाते हुए 8 से 10 मिनट तक मलाईदार होने तक पकाएँ।
- एक छोटी कड़ाही में बाक़ी 2 बड़े चम्मच मक्खन पिघलाएँ। पेकान और दालचीनी डालकर 2 से 3 मिनट तक ख़ुशबू आने और हल्का सुनहरा होने तक भूनें। कैरेमलाइज़ करने के लिए मेपल सिरप मिलाएँ और सजाने के लिए एक चम्मच भर अलग रख दें।
- मक्खन में भुने बाक़ी पेकान दलिये में मिला दें। क्रीम डालें और स्वादानुसार थोड़ी और दालचीनी या मेपल सिरप मिलाएँ।
- कटोरों में परोसें और ऊपर से अलग रखे पेकान, मेपल सिरप की एक धार और अंत में कच्चा शहद डालें। शहद परोसने के बाद ही डालें, ताकि उसके एंज़ाइम और गुण बने रहें। चाहें तो ऊपर से क्रीम की एक और धार डाल दें।
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यह लेख Cristina MacArthur के "How To Make Oatmeal Healthier" का रूपांतरण है, जिसे Weston A. Price Foundation ने 2026 में प्रकाशित किया था। मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ें।
As informações têm caráter educativo e não substituem avaliação individual de profissional de saúde habilitado.



